होम/साईं संग्रह/तात्या को बाबा का आशीर्वाद

sai baba

शिरडी में सबसे पहले साईं बाबा ने वाइजाबाई के घर से ही भिक्षा ली थी| वाइजाबाई एक धर्मपरायण स्त्री थी| उनकी एक ही संतान तात्या था, जो पहले ही दिन से साईं बाबा का परमभक्त बन गया था|
वाइजाबाई ने यह निर्णय कर लिया था कि वह रोजाना साईं बाबा के लिए खाना लेकर स्वयं ही द्वारिकामाई मस्जिद जाया करेगी और अपने हाथों से बाबा को खाना खिलाया करेगी| अब वह रोजाना दोपहर को एक टोकरी में खाना लेकर द्वारिकामाई मस्जिद पहुंच जाती थी| कभी साईं बाबा धूनी के पास अपने आसन पर बैठे हुए मिल जाया करते और कभी उनके इंतजार में वह घंटों तक बैठी रहती थी| वह न जाने कहां चले जाते थे ? इस सबके बावजूद वाईजाबाई उनका बराबर इंतजार करती रहती थी| कभी-कभार बहुत ज्यादा देर होने पर वह उन्हें ढूंढने के लिए निकल जाया करती थी|
कभी-कभी जंगलों में भी ढूंढने के लिए चली जाती थी| कड़कड़ाती धूप हो या मूसलाधार बारिश अथवा हडि्डयों को कंपा देने वाली ठंड हो, वाइजाबाई साईं बाबा को ढूंढती फिरती और जब उसे कहीं ने मिलते तो वह निराश होकर फिर द्वारिकामाई मस्जिद लौट आती थी|
एक दिन वाइजाबाई जब बाबा को खोजती, थकी-मांदी मस्जिद पहुंची तो उसने बाबा को धूनी के पास अपने आसन पर बैठे पाया|वाईजाबाई को देखकर बाबा बोले - 'मां, मैं तुम्हें बहुत ही कष्ट देता हूं| जो बेटा अपनी माँ को दुःख दे, उससे अधिक अभागा और कोई नहीं हो सकता है|मैं अब तुम्हें बिल्कुल भी कष्ट नहीं दूंगा| जब भी तुम खाना लेकर आया करोगी, मैं तुम्हें मस्जिद में ही मिला करूंगा|' साईं बाबा ने वाइजाबाई से कहा|
उस दिन के बाद बाबा खाने के समय कभी भी मस्जिद से बाहर न जाते थे| वाइजाबाई खाना लेकर मस्जिद पहुंचती तो बाबा उसे वहां पर अवश्य मिलते|
'साईं बाबा... !' वाइजाबाई ने कहा|
'ठहरो मां... !' साईं बाबा खाना खाते-खाते रुक गए और बोले - 'मैं तुम्हें माँ कहता ही नहीं, अपनी आत्मा से भी मानता हूं|'
'तू मेरा बेटा है| तू ही मेरा बेटा है| तूने माँ कहा है न|' वाइजाबाई प्रसन्नता से गद्गद् होकर बोली|
'तुम बिल्कुल ठीक कहती हो मां ! मुझ जैसे अनाथ, अनाश्रित और अभागे को अपना बेटा बनाकर तुमने बड़े पुण्य का काम किया है मां|' साईं बाबा ने कहा - 'इन रोटियों में जो तुम्हारी ममता है, क्या पता मैं तुम्हारे इस ऋण से कभी मुक्त हो भी पाऊंगा या नहीं ?'
'यह कैसी बात कर रहा है तू बेटा ! मां-बेटे का कैसा ऋण ? यह तो मेरा कर्त्तव्य है| कर्त्तव्य में ऋण की बात कहा ?' वाइजाबाई ने कहा - 'इस तरह की बातें आगे से बिल्कुल मत करना|'
'अच्छा-अच्छा नहीं कहूंगा| फिर कभी नहीं कहूंगा|' साईं बाबा ने जल्दी से अपने दोनों कानों को हाथ लगाकर कहा - 'तुम घर जाकर तात्या को भेज देना|'
'वो तो लकड़ी बेचने गया है| आते ही भेज दूंगी|' कहने के पश्चात् वाइजाबाई के चेहरे पर सहसा गहरी उदासी छा गयी|
वाइजाबाई की आपबीती सुनकर साईं बाबा की आँखें भीग गयीं| वह कुछ देर तक मौन बैठे रहे और फिर बोले - 'वाइजा मां, भगवान् भला करेंगे, फिक्र मत करो| सुख और दुःख तो इस जिंदगी के जरूरी अंग हैं| जब तक इंसान इस दुनिया में जिंदा रहता है, उसे यह सब तो भोगना ही पड़ता है|'
वाइजाबाई की आँखें भर आयी थीं| उसने अपनी टोकरी उठाई और थके-हारे कदमों से वह अपने घर की ओर वापस चल पड़ी|
तात्या अभी थोड़ी-सी ही लकड़ियां काट पाया था कि अचानक आकाश में काली-काली घटाएं उमड़ने लगीं, बिजली कड़कने और गरजने से जंगल का कोना-कोना गूंज उठा| तात्या के पसीने से भरे चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गयीं| वह सोचने लगा, अब क्या होगा? इन लकड़ियों के तो कोई चार पैसे भी नहीं देगा - और यदि यह भीग गई तो कोई मुफ्त में भी नहीं लेगा| घर में एक मुट्ठी अनाज नहीं है, तो रोटी कैसे बनेगी ? तब रात को माँ साईं बाबा को क्या खिलायेगी ? इसी चिंता में डूबे तात्या ने जल्दी से लड़कियां समेटीं और गांव की ओर चल पड़ा| तभी बड़े जोर से मूसलाधार बारिश शुरू हो गई| वह जल्दी-जल्दी पांव बढ़ाने लगा|
अभी वह गांव से कुछ ही दूरी पर था कि अचानक एक तेज अवाज सुनाई दी - 'ओ लकड़ी वाले !'
उसके बढ़ते हुए कदम थम गए|
उसने जोर से पुकारा - 'कौन है भाई ?'
और तभी एक आदमी उसके सामने आकर खड़ा हो गया|
'क्या बात है ?' तात्या ने पूछा|
'लकड़ियां बेचोगे ?' उस आदमी ने पूछा|
'हां-हां, क्यों नहीं बेचूंगा भाई ! मैं बेचने के लिए ही तो रोजाना जंगल से लकड़ियां काटकर लाता हूं|' तात्या ने जल्दी से जवाब दिया|
'कितने पैसे लोगे इन लकड़ियों के ?'
'जो मर्जी हो, दे दो| आज तो लकड़ियां बहुत कम हैं और वैसे भी भीग भी गई हैं| जो भी दोगे ले लूंगा|'
'लो, यह रुपया रख लो|'
तात्या हैरानी से उस व्यक्ति को देखने लगा|
'कम है तो और ले लो|' उस आदमी ने जल्दी से जेब से एक रुपया और निकालकर तात्या की ओर बढ़ाया|
' नहीं-नहीं, कम नहीं है, ज्यादा हैं| लकड़ियां थोड़ी हैं|' तात्या ने जल्दी से कहा|
'तो क्या हुआ, आज से तुम रोजाना मुझे यहां पर लकड़ियां दे जाया करो| मैं तुम्हें यहीं मिला करूंगा| यदि आज ये लकड़ियां कुछ कम हैं, तो कल लकड़ियां ज्यादा ले आना| तब हमारा-तुम्हारा हिसाब बराबर हो जाएगा|' उसने हँसते हुए कहा और रुपया जबरदस्ती उसके हाथ पर रख दिया|
तात्या ने रुपये जल्दी से अपने अंगरखे की जेब में रखे और फिर तेजी से गांव की ओर चल दिया| घर पहुंचकर उसने माँ के हाथ पर रुपये रखे तो माँ आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगी|
'इतने रुपये कहां से ले आया तात्या ?' माँ ने आशंकित होकर पूछा| तात्या ने अपनी माँ को पूरी घटना बता दी|
'ये तूने ठीक नहीं किया बेटा| कल उसे ज्यादा लकड़ियां दे आना| इंसान को अपनी ईमानदारी की कमाई पर ही संतोष करना चाहिए| बेईमानी का जरा-सा भी विचार कभी अपने मन में नहीं लाना चाहिए|' वाइजाबाई ने तात्या को समझाते हुए कहा|
अगले दिन जब तात्या जंगल में गया तो उस समय वर्षा रुक गयी थी| आकाश एकदम साफ था| तात्या ने जल्दी-जल्दी और दिन से ज्यादा लकड़ियां काटीं और गट्ठर बनाने लगा| गट्ठर भारी था| रोजाना तो वह अकेले ही लकड़ियों का गट्ठर उठाकर सिर पर रख लिया करता था, लेकिन आज लकड़ियां ज्यादा थीं| वह अकेला उस गट्ठर को उठा नहीं सकता था| वह किसी मुसाफिर की राह देखने लगा ताकि उसकी सहायता से उस भारी गट्ठर को उठाकर सिर पर रख सके|अचानक उसे सामने से एक मुसाफिर आता हुई दिखाई दिया| जब वह पास आ गया तो तात्या ने उससे कहा -'भाई ! जरा मेरा बोझा उठवा दो|' उस मुसाफिर ने तात्या के सिर पर गट्ठर उठवाकर रखवा दिया| अब तात्या तेजी से चल पड़ा|
'अरे भाई तात्या, क्या बात है, आज तुमने इतनी देर कैसे कर दी ? मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं|' पिछले दिन वाले आदमी ने मुस्कराते हुए कहा|
'आज लकड़ियां और दिन के मुकाबले ज्यादा हैं| रोजाना लकड़ियां कम होती थीं, इसलिए मैं अकेला ही गट्ठर होने के कारण मैं उसे अकेला नहीं उठा पा रहा था| बहुत देर बाद जब एक आदमी आया मैं उसकी सहायता से गट्ठर उठवाकर सिर पर रख पाया, तो सीधा भागता हुआ चला आया हूं|'
उस आदमी ने लकड़ी के गट्ठर पर एक नजर डाली और बोला - 'आज तो तुम ढेरसारी लकड़ियां काट लाए|'
'तुम ठीक कर रहे हो| लेकिन कल तुम्हें बहुत कम लकड़ियां मिली थीं| पर, तुमने पैसे पूरे दे दिए थे| इसलिए तुम्हारा हिसाब भी तो बराबर करना था| कल तुमने रुपये दे दिये थे| उसी के बदले सारी लकड़ियां ले जाओ| अब तक का हिसाब बराबर|' तात्या ने हँसते हुए कहा|
'कहां ठीक है तात्या भाई ! जिस तरह तुम ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ता चाहते, उसी तरह मैंने भी बेईमानी करना नहीं सीखा|' उस आदमी ने कहा और अपनी जेब से रुपया निकालकर तात्या की हथेली पर रख दिया - 'लो, इसे रखो| हमारा आज तक का हिसाब-किताब बराबर| आज लकड़ियां और दिनों से दोगुनी हैं, इसलिए हिसाब भी दोगुना होना चाहिए|'
तात्या ने रुपया लेने से बहुत इंकार किया| पर उस आदमी ने समझा-बुझाकर वह रुपया तात्या को लेने पर विवश कर| तात्या ने वह रुपया जेब में रखा, फिर वह गांव की ओर चल दिया|
अभी वह थोड़ी ही दूर गया था कि अचानक उसे कुल्हाड़ी की याद आयी| जल्दबाजी में वह कुल्हाड़ी जंगल में ही भूल आया था| अपनी भूल का अहसास होते ही वह तेजी से जंगल की ओर लौट पड़ा| अब उसे वह आदमी और लड़कियों का गट्ठर कहीं भी दिखाई न दिया| उसने बहुत दूर-दूर तक नजर दौड़ाई, लेकिन उस आदमी का कहीं भी अता-पता न था| तात्या की हैरानी की सीमा न रही| दोपहर का समय था| आखिर वह आदमी इतनी जल्दी इतना बोझ उठाकर कहां चला गया ? दूर-दूर तक उस आदमी का पता न था| आश्चर्य में डूबा तात्या वापस आ गया| वह इस बात को किसी से कहे या न कहे, इस बात का फैसला नहीं कर पा रहा था|
घर आकर वह अपनी माँ के साथ द्वारिकामाई मस्जिद आया| वाइजाबाई ने दोनों को खाना लगा दिया| खाना खाते समय तात्या ने लकड़ी खरीदने वाले के बारे में साईं बाबा को बताया| साईं बाबा बोले -'तात्या, इंसान को वही मिलता है, जो परमात्मा ने उसके भाग्य में लिखा है| इसमें कोई संदेह नहीं है कि बिना गेहनत किये धन नहीं मिलता है, फिर भी धन-प्राप्ति में मनुष्य के कर्मों का भी बहुत योगदान होता है| वैसे चोर-डाकू भी चोरी-डाका डालकर लाखों रुपये ले आते हैं, लेकिन वे सदैव गरीब-के-गरीब ही बने रहते हैं| न तो उन्हें समय पर भरपेट भोजन ही मिलता है और न चैन की नींद आती है, जबकि एक गरीब आदमी थोड़ी-सी मेहनत करके इतना पैसा पैदा कर लेता है कि जिससे बड़े आराम से उसका और उसके परिवार की गुजर-बसर हो सके| वह स्वयं भी इत्मीनान से रूखी-सूखी खाता है और चैन की नींद सोता है तथा मुझ जैसे फकीर की झोली में भी रोटी का एक-आध टुकड़ा डाल देता है| तुम्हें जो कुछ मिलता है, वह तुम्हारे भाग्य में लिखा है|'
'लेकिन वह आदमी और लकड़ियों का गट्ठर कहां गायब हो गए ?' तात्या ने हैरानी से पूछा|
'भगवान के खेल भी बड़े अजब-गजब हैं, तात्या ! इंसान अपनी साधरण आँखों से उसे देख नहीं पाता|' साईं बाबा ने गंभीर होकर कहा - 'तुम्हें बेवजह परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है| यह तो देने वाला जानता है कि वह किस ढंग से और किस जरिये रोजी-रोटी देता है| भगवान जब किसी भी प्राणी को इस दुनिया में भेजता है, तो उसे भेजने से पहले उन सभी चीजों को भेज देता है, जिसकी उस जन्म लेने वाले को जरूरत पड़ती है|' साईं बाबा ने तात्या को बड़े ही प्यार से समझाया|
तात्या साईं बाबा के चरणों में गिर गया| उसे साईं बाबा की बात पर सहसा विश्वास न हो पा रहा था| वह कहना चाहता था कि बाबा, यह सब आपका ही करिश्मा है| इस प्रकार का खेल खेलकर आप ही उसकी रोटी का इंतजाम कर रहे हैं| उसने बहुत चाहा कि वह इस बात को साईं बाबा से कहे, पर कह नहीं पाया और केवल आँसू टपकाता रह गया|
वास्तव में तात्या के मन में साईं बाबा के प्रति अपार श्रद्धा और अटूट विश्वास था| इसी कारण बाबा का भी उस पर विशेष स्नेह था|
अचानक साईं बाबा उठकर खड़े हो गए और बोले - 'चलो तात्या, घर चलो|' कहकर मस्जिद की सीढ़ियों की ओर चल दिये|
साईं बाबा सीधे वाइजाबाई की उस कोठरी में गए, जहां पर वह सोया करती थी| उस कोठरी में एक पलंग पड़ा था|
'तात्या, एक फावड़ा ले आओ|' साईं बाबा ने कोठरी में चारों ओर निगाह घुमाते हुए कहा|
तात्या फावड़ा ले आया| उसकी और वाइजाबाई की कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि साईं बाबा ने फावड़ा क्यों मंगाया है?
'तात्या, इस पलंग के सिरहाने वाले दायें ओर के पाएं के नीचे खोदो|' इतना कहकर साईं बाबा ने पलंग एक ओर को सरका दिया|
'यहां क्या है बाबा ?' तात्या ने पूछा|
'खोदो तो सही|' साईं बाबा ने कहा|
तात्या ने अभी तीन-चार फावड़े ही मारे थे कि अचानक फावड़ा किसी धातु से टकराया|
'धीरे-धीरे मिट्टी हटाओ, तात्या|' साईं बाबा ने गड्ढे में झांकते हुए कहा|
तात्या फावड़े से धीरे-धीरे मिट्टी हटाने लगा| कुछ देर बाद उसने तांबे का एक कलश निकालकर साईं बाबा के सामने रख दिया|
'इसे खोलो, तात्या !'
तात्या ने कलश पर रखा ढक्कन हटाकर उसे फर्श पर उलट दिया| देखते-ही-देखते उस कलश में से सोने की अशर्फियां, मूल्यवान जेवर और हीरे निकलकर बिखर गए|
'यह तुम्हारे पूर्वजों की सम्पत्ति है| तुम्हारे भाग्य में ही मिलना लिखा था, तुम्हारे पिता के भाग्य में यह सम्पत्ति नहीं थी|' साईं बाबा ने कहा - 'इसे संभालकर रखो और समझदारी से खर्च करो|'
वाइजा और तात्या के आश्चर्य का कोई ठिकाना न था| वह उस अपार सम्पत्ति को देख रहे थे और सोच रहे थे कि यदि उन पर साईं बाबा की कृपा न होती तो सम्पत्ति उन्हें कभी भी प्राप्त न होती| तात्या ने अपना सिर साईं बाबा के चरणों पर रख दिया और फूट-फूटकर बच्चों की तरह रोने लगा|
वाइजाबाई बोली - 'साईं बाबा ! हम यह सब रखकर क्या करेंगे| हमारे लिए तो रूखी-सूखी रोटी ही बहुत है| आप ही रखिये और मस्जिद के काम में लगा दीजिए|'
साईं बाबा ने वाइजाबाई का हाथ पकड़कर कहा -'नहीं मां ! यह सब तुम्हारे भाग्य में था| यह सारी सम्पत्ति केवल तुम्हारी है| मेरी बात मानो, इसे अपने पास ही रखो|'
साईं बाबा की बात को वाइजाबाई को मानना ही पड़ा| उसने कलश रख लिया| तब साईं बाबा चुपचाप उठकर अपनी मस्जिद में वापस आ गये और धूनी के पास इस प्रकार लेट गये, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है|
तात्या ने इस सम्पत्ति से नया मकान बनवा लिया और बहुत ही ठाठ-बाट से रहने लगा| गांव वाले हैरान थे कि अचानक तात्या के पास इतना पैसा कहां से आया ? वे इस बात को तो जानते थे कि साईं बाबा तात्या की माँ वाइजाबाई को माँ कहकर पुकारते हैं और तात्या से अपने भक्त या शिष्य की तरह नहीं, बल्कि छोटे भाई के समान स्नेह करते हैं| अत: सबको विश्वास हो गया कि तात्या पर साईं बाबा की ही कृपा हुई है| इसी कृपा से वह देखते-ही-देखते सम्पन्न हो गया है|
तात्या को सम्पन्न देख धन के लोभी, लालची लोग भी साईं बाबा के पास जाने लगे| रात-दिन सेवा किया करते कि शायद साईं बाबा प्रसन्न हो जाएं और उन्हें भी धनवान बना दें| साईं बाबा उन लोगों की भावनाओं को अच्छी तरह से जानते थे| वह न तो उन्हें मस्जिद में आने से रोकना चाहते थे और न ही उन्हें डांटना चाहते थे| उनका विश्वास था कि यहां आते-आते या तो इनके विचार ही बदल जायेंगे या फिर निराश होकर स्वयं ही आना बंद कर देंगे| वह किसी को कुछ न कहते थे| चुपचाप अपनी धूनी के पास बैठे तमाशा देखा करते थे| कुछ तो इतने बेशर्म लोग थे कि साईं बाबा ने एकदम स्वयं को धनवान बनाने के लिए कहते - 'बाबा, हमें भी तात्या का तरह धनवान बना दो|'
उन लोगों की बातें सुनकर साईं बाबा हँस पड़ते और बोलते - 'मैं कहां से कुछ कर सकता हूं| मैं तो स्वयं कंगाल हूं, भला मेरे पास कहां से कुछ आया|'
साईं बाबा का ऐसा जवाब सुनकर सब चुप रह जाते| फिर आगे कोई भी कुछ न कह पाता था|

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